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Thursday, March 12, 2009

बंगलादेश में सैनिक विद्रोह ..

आज बांग्लादेश सुलग रहा है । वहां जिस तरह बांग्लादेश राइफल के जवानों ने अपने अधिकारिओं और अन्य जवानों की हत्या की उसकी आंच हमपर भी आएगी । बांग्लादेश रायफल में विद्रोह इस उपमहाद्वीप में नई प्रवृति की शुरुआत कर सकता है । कई साल पहले पिर्दिवाह की घटना के समय ही बी डी आर का असली चेहरा खुलकर सामने आ गया था । अब पर्दाफाश भी हो गया ।
इस विद्रोह की दो प्रमुख वजहें बताई जा रही हैं। बीडीआर के जवान सेना के जवानों जैसा वेतन और अन्य सुविधाएं नहीं मिलने और बीडीआर के सभी उच्च पदों पर सेना के अफसरों की तैनाती से नाराज थे। उनकी नाराजगी की दूसरी बड़ी वजह यूएन पीस मिशन पर बीडीआर के जवानों को नहीं भेजा जाना बताई जा रही है। पर ये दोनों इतनी बड़ी वजहें नही है की वे






अधिकारियों के घरों में घुसकर लूटपाट करते और उनकी पत्नियों से बलात्कार कर डालते। कई अफसरों को जिन्दा जमीं में गाड़ देते ।
यह बगावत अचानक नहीं हुई है । ऐसे संकेत और सबूत हैं कि इस नरसंहार के लिए लंबे समय से तैयारी की जा रही थी। खुफिया जानकारियों के अनुसार चटगांव, राजशाही और खुलना में इस से पहले कई गुप्त बैठकें हुई थीं, जिनमें इस घटना को अंजाम देने का खाका तैयार किया गया था। बगावत के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार माने जा रहे बीडीआर के डिप्टी अडिशनल डाइरेक्टर तौहीदुल आलम ने भी इन बैठकों में शिरकत की थी। वारदात को अंजाम देने के लिए तारीख भी बहुत सोच-समझकर चुनी गई थी। बांग्लादेश के पूर्व सैनिक और खुफिया एजंसी अधिकारियों के मुताबिक इस बगावत का जिम्मा प्रफेशनल किलर स्क्वॉड को सौंपा गया था . उन्हें बीडीआर जवानों की वर्दी पहना कर अंदर भेजा गया था।

बगावत अचानक नहीं हुई और जवानों ने किसी उत्तेजना में गोलियां नहीं चलाईं, यह इस बात से भी साफ है कि हत्यारों के चेहरे लाल कपड़े से ढके हुए थे और वे दरबार हाल के अलग-अलग दरवाजों से दाखिल हुए थे। यही नहीं, वारदात के बाद भागने के लिए जिन रास्तों का इस्तेमाल किया गया, जहां से वही आदमी निकल सकता था जो उस इलाके से पहले से परिचित हो। घटना के बाद बीडीआर का शस्त्रागार भी लूटा गया और उसके दो सौ साल पुराने रेकॉर्ड रूम को आग लगा दी गई। इस बात से पता चलता है की कितने गुप्त तरीके से इस घटना की तैयारी की गई थी ।
इस साजिश की जड़ें कहां थीं और इसका मकसद क्या था? कहीं इसमें बांग्लादेश के शिपिंग जाइंट सलाउद्दीन का तो कोई हाथ नहीं था? इधर इस मामले में जब से सलाउद्दीन का नाम सामने आया है, कई उलझी हुई कडि़यां अपने-आप ही खुलने लगी हैं। यह किसी से छिपा नहीं है कि चटगांव आर्म्स ड्रॉप केस में अल्फा उग्रवादियों तक हथियार पहुंचाने के लिए किस तरह सलाउद्दीन के जहाजों का इस्तेमाल किया गया था। पाकिस्तान की सैनिक खुफिया एजंसी आईएसआई और बांग्लादेश की विपक्षी पार्टी बीएनपी से भी उसके करीबी रिश्ते हैं।

बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम में प्रमुख भूमिका निभाने वाले बीडीआर में बगावत भड़काने की साजिश में आईएसआई की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। माना जा रहा है कि इस बगावत का मकसद बांग्लादेश की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार दो प्रमुख सैनिक बलों -बांग्लादेश सेना और बीडीआर- दोनों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर के देश में गृहयुद्ध जैसे हालात पैदा कर देना था।
वेतन और सुविधाओं में बेहतरी के नाम पर की गई एक सुरक्षा बल की इस बगावत का असली निशाना दरअसल बांग्लादेश में लंबे अंतराल के बाद चुनी गई लोकतांत्रिक सरकार ही थी। और यही नहीं, अगर बगावत अपने उद्देश्य में पूरी तरह कामयाब हो जाती, तो यह न केवल बांग्लादेश, बल्कि भारत के लिए भी एक बहुत बड़ा झटका होती। आगे भारत को बांग्लादेश की स्थिति पर गहराई से विचार करना होगा । साथ ही ऐसी प्रवृति पर रोक लगाने के लिए कारगर उपाय करना होगा ।

Monday, February 23, 2009

देश को सबसे ज्यादा खतरा बंगलादेशी कीडों से है ...

हम तो भाई उनसे तंग आ गए है । हर गली चौराहे में मिल जाते है । आतंरिक शान्ति के लिए खतरा बन गए है । आतंकवादी घटनाओं में भी शामिल है । चोरी चमारी तो उनकी आदत बन गई है । ऐसा हम तो सोचते है ही ,सरकार और कोर्ट का भी यही मानना है । पर हमारी सरकार ........ उसपर तो कमेन्ट करना मुर्खता है । जानते हुए छोटे घाव को कैसे नासूर बनाया जाता है ? यह सीखना हो तो कोई इसे सरकार से सीखे ।सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है की हरेक भारतीय के पास पहचान पत्र होना चाहिए । जिससे की उनकी नागरिकता पहचानी जा सके । सीमावर्ती इलाकों में तो इसे अनिवार्य कर देना चाहिए । कोर्ट ने सरकार से जबाब भी माँगा ......पर वह लगता है सो गई है । यह नासूर इस कंट्री को ही तबाह कर देगा जिस तरह स्पेन का नासूर नेपोलियन को और साउथ का नासूर औरंगजेब को बरबाद कर दिया । समय रहते चेत जाने में ही समझदारी है ।ऐसे लोगो को भी सबक सिखाया जाय जो बिना सोचे समझे बंगालादेशिओं को नौकर बना लेते है । कैम्पों में अबैध बंगालादेशिओं को वे समान उपलब्ध है जो यहाँ के अधिकाँश नागरिकों को भी नही है । रासन कार्ड , नौकरी , शिक्षा का अधिकार देश के नागरिकों को है न की अबैध नागरिकों को ।बन्ग्लादेशिओं को पनाह देने में पश्चिम बंगाल और असाम का बड़ा हाथ है । वह वे पहचान में ही नही आते की कौन देशी है और कौन विदेशी ...... नेता अपनी नेतागिरी से बाज नही आते । एक दिन देश की जनता उनसे सवाल जरुर करेगी । तब उन्हें बचाने के लिए कोई बंगलादेशी नही आयेगा