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Wednesday, February 9, 2011

बलबन

बलवन दिल्ली सल्तनत का पहला शासक था जिसने राजत्व की संकल्पना की और लूई चौदहवें की भांति राज्य को एक गंभीर पेशा बनाया . अलाउद्दीन  खिलजी ने उसके राजत्व की संकल्पना में बदलाव कर उसे नया रूप दिया .उसने बलवन से रक्त और लौह की निति को ग्रहण किया जबकि तुर्की नस्लवाद को छोड़ दिया .उसने जलालुद्दीन खिलजी की परोपकारिता की निति को भी त्याग दिया जबकि धर्मनिरपेक्ष तत्वों को अपनाया .बलवन अपने को व्यक्तिगत बलवन से शासक बलवन के रूप में ढाल लिया .एक तरफ जहाँ उसने तुर्की नस्लवाद को बढ़ावा दिया वहीँ दूसरी तरफ उसने अपने तुर्की विरोधियों को इस क्रूरता के साथ कुचला की भारत में तुर्की नस्ल का पराभव हो गया .वह मंगोलों से निपटने में भी पूरी तरह सक्षम नहीं हुआ ,उसके समय में दिल्ली सल्तनत की सीमा सिन्धु नदी से सिकुड़ कर व्यास नदी तक रह गयी .सुलतान के महत्व को प्रदर्शित करने के लिए उसने कुछ गैर इस्लामिक प्रथाओं को भी बढ़ावा दिया जैसे नौरोज ,सिजदा पैबोस आदि .
बलवन ने सुलतान की गरिमा को बढाने में जरुर सफल हुआ .उसने नए क्षेत्रों को जितने पर ध्यान न देकर आंतरिक व्यवस्था और अपने क्षेत्रों को सुरक्षित बनाने पर ही ध्यान दिया जो समय की मांग भी थी .  वह पहला शासक था जिसने राज्य को गंभीर पेशा बनाया और राजत्व की संकल्पना की .